भारत गणराज्य की पहली महिला राज्यपाल सरोजिनी नायडू की इतिहास
स्वतंत्र भारत की पहली महिला उत्तर प्रदेश राज्यपाल थी इनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक नामी विद्वान तथा माँ कवयित्री थीं और बांग्ला में लिखती थीं। बचपन से ही कुशाग्र-बुद्धि होने के कारण उन्होंने १२ वर्ष की अल्पायु में ही १२हवीं की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण की और १३ वर्ष की आयु में लेडी ऑफ दी लेक नामक कविता रची। सर्जरी में क्लोरोफॉर्म की प्रभावकारिता साबित करने के लिए हैदराबाद के निज़ाम द्वारा प्रदान किए गए दान से “सरोजिनी नायडू” को इंग्लैंड भेजा गया था सरोजिनी नायडू को पहले लंदन के किंग्स कॉलेज और बाद में कैम्ब्रिज के गिरटन कॉलेज में अध्ययन करने का मौका मिला। सरोजनी नायडू (13 फरवरी 1879 – 2 मार्च 1949) एक प्रमुख भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, कवयित्री और राजनेता थीं, जिन्हें महात्मा गांधी ने ” भारत की कोकिला” (Nightingale of India) का खिताब दिया था। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला और स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल (उत्तर प्रदेश) थीं।
सरोजनी नायडू के बारे में मुख्य विवरण:
● स्वतंत्रता संग्राम: उन्होंने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कई बार गिरफ्तार की गईं। उन्होंने महात्मा गांधी के साथ दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह) में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
● राजनीतिक जीवन: 1925 में, वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कानपुर अधिवेशन की अध्यक्ष चुनी गईं। आजादी के बाद, 1947 में उन्हें संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) का राज्यपाल बनाया गया, जो भारत के किसी राज्य की पहली महिला राज्यपाल थीं।
● साहित्यिक योगदान: उन्हें एक निपुण कवयित्री के रूप में जाना जाता है, जिनकी रचनाओं में ‘द गोल्डन थ्रेशोल्ड’ और ‘द ब्रोकन विंग्स’ शामिल हैं। ‘इन द बाजार ऑफ हैदराबाद’ उनकी सबसे प्रसिद्ध कविताओं में से एक है।
● महिला अधिकार: वे महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा और सशक्तिकरण की मुखर समर्थक थीं।
● प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म हैदराबाद में एक बंगाली परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई मद्रास, लंदन और कैम्ब्रिज में की। उनके योगदान को देखते हुए, उनका जन्मदिन 13 फरवरी भारत में राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत कोकिला सरोजिनी नायडू भारत की महान कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी थीं।
सिर्फ 13 वर्ष की आयु में कविता लिखकर उन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया और आगे चलकर उनकी काव्य प्रतिभा ने विश्वभर में पहचान बनाई। उनकी प्रमुख कृतियों में “द गोल्डन थ्रेशोल्ड, द बर्ड ऑफ टाइम और द ब्रोकन विंग जैसी अमर रचनाएँ शामिल हैं, जिनमें प्रेम, प्रकृति और देशभक्ति की मधुर झंकार सुनाई देती है। जो आज भी देशप्रेम और संवेदनाओं की सजीव धरोहर मानी जाती है उनकी जयंती पर शत-शत नमन।
डाॅ बासुदेव कुमार शर्मा
प्रधान संपादक (वैज्ञानिक)
विज्ञानमेव जयते RNI. भारत सरकार.
