चित्रलेखा (उपन्यास)पर आधारित है एपस्टीन की कहानी, नब्बे फीसदी लोग गुप्त एपस्टीन का फाइल है ।
चित्रलेखा (उपन्यास)पर आधारित है एपस्टीन की कहानी, नब्बे फीसदी लोग गुप्त एपस्टीन का फाइल है.
चित्रलेखा उपन्यास भगवतीचरण वर्मा द्वारा रचित है , इस उपन्यास में “पाप और पुण्य क्या है”,
चित्रलेखा भगवती चरण वर्मा द्वारा रचित हिन्दी उपन्यास है। यह न केवल भगवतीचरण वर्मा को एक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने वाला पहला उपन्यास है बल्कि हिन्दी के उन विरले उपन्यासों में भी गणनीय है जिनकी लोकप्रियता काल की सीमा को लाँघती रही है।
1934 में प्रकाशित ‘चित्रलेखा’ ने लोकप्रियता के कई पुराने कीर्तिमान बनाए थे। कहा जाता है कि अनेक भारतीय भाषाओं में अनूदित होने के अतिरिक्त केवल हिन्दी में नवें दशक तक इसकी ढाई लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी थीं। 1940 में [केदार शर्मा] के निर्देशन में “चित्रलेखा” पर एक फिल्म भी बनी।
चित्रलेखा की कथा पाप और पुण्य की समस्या पर आधारित है। पाप क्या है? उसका निवास कहाँ है? – इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए महाप्रभु रत्नाकर के दो शिष्यों, श्वेतांक और विशालदेव, क्रमश: सामंत बीजगुप्त और योगी कुमारगिरि की शरण में जाते हैं। और उनके निष्कर्षों पर महाप्रभु रत्नांबर की टिप्पणी है, ‘‘संसार में पाप कुछ भी नहीं है, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।
चित्रलेखा अपने जीवन की बागडोर अपने हाथों में लेती है और सामाजिक मानदंडों और दबावों से प्रभावित होने से इनकार करती है। आत्म-चिंतन और अहंकार को अपने उद्धार के मार्ग में बाधा न बनने देने का उसका दृढ़ निश्चय उसे विजय की ओर ले जाता है, क्योंकि वह जुनून में शांति और शांति में जुनून दोनों को पाती है।
उपन्यास में कथा होती है, घटनाएँ होती हैं, कल्पनाएँ, यथार्थ आदि का समावेश होता है । उपन्यास की परिभाषा प्रेमचन्द : “मैं उपन्यास को मानव- चरित्र का चित्र मात्र समझता हूँ । मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है ।” ऐसे तो मानव का चरित्र अनंत है चरित्र का खोज चरित्रवाले करते है, चरित्रहीन का खोज चरित्रहीन करते है, चरित्रहीन का प्रचारक नब्बे प्रतिशत लोग हैं, जबकि चरित्र का विकास और सुधार, का प्रचार प्रसार करने वाले दस प्रतिशत लोग हैं, एपस्टीन का चरित्र का चित्रण ऐसे हीं चित्रलेखा पर कर सकते है। आज भी अनेकानेक चित्रलेखा और रत्नाकर समाज में मौजूद है ,लेकिन समाज निर्माण की बात सिर्फ वहीं लोग करते है, जिनको चित्रलेखा की खोज रहती है। अब समाज में त्रिस्तरीय चरित्र के लोग व्यवस्थित दृष्टिकोण से एपस्टीन की कहानी लिख चुके है, मौका मिलते हीं व्याकरणयुक्त चरित्र को चरित्रहीनता बदलाव कर लेते हैं और रूपये, मुद्रा के बल पर बन्द हो जाते है। आज वर्तमान युग में जिसने भी एपस्टीन का फाइल खोला हैं, उसका भी फाइल खोलकर देखिए, ये सारे एपस्टीन के खोजकर्ता, एपस्टीन से बहुत आगे हैं।
डाॅ बासुदेव कुमार शर्मा
प्रधान संपादक ( वैज्ञानिक)
विज्ञानमेव जयते RNI. भारत सरकार.
“””””””””””””””””””””””””””””””
