रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन का इतिहास 

नई दिल्ली: ( राजधानी क्षेत्र)- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की स्थापना 1958 में भारतीय सशस्त्र बलों के लिए आधुनिक रक्षा तकनीक विकसित करने के उद्देश्य से की गई थी। यह रक्षा मंत्रालय के तहत कार्य करता है और इसका गठन रक्षा विज्ञान संगठन (DSO), तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय (DTDP) और तकनीकी विकास प्रतिष्ठानों (TDEs) के विलय से हुआ था। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है और यह भारत की सैन्य आत्मनिर्भरता का प्रमुख आधार है।

DRDO का इतिहास और प्रमुख तथ्य:

स्थापना: 1958 में एक छोटे संगठन के रूप में, जिसमें मात्र 10 प्रयोगशालाएँ शामिल थीं।

1. उद्देश्य: रक्षा के क्षेत्र में अनुसंधान, डिजाइन और विकास के माध्यम से भारत को आत्मनिर्भर बनाना।

2. प्रगति: वर्तमान में यह 50 से अधिक प्रयोगशालाओं का एक विशाल नेटवर्क है, जो वैमानिकी, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, नौसेना प्रणाली और जीवन विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रहा है।

3. प्रमुख उपलब्धियाँ:

मिसाइलें: अग्नि (Agni), पृथ्वी (Prithvi), आकाश (Akash), और नाग (Nag) जैसी मिसाइलें विकसित कीं।

4. स्वदेशी तकनीक: हल्के लड़ाकू विमान तेजस (Tejas), रडार, और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों का विकास।

5. यंग साइंटिस्ट लैब्स: नई पीढ़ी के वैज्ञानिकों को बढ़ावा देने के लिए डीआरडीओ युवा वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं की स्थापना।

6. ध्येय वाक्य (Motto): “बलस्य मूलं विज्ञानम्” ( शक्ति का स्रोत विज्ञान है )।

7. हालिया फोकस: आत्मनिर्भर भारत के तहत रक्षा निर्यात बढ़ाने और उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों में अग्रणी बनने पर ध्यान केंद्रित। DRDO ने पिछले 6 दशकों से अधिक समय में रक्षा प्रौद्योगिकियों में भारत को आत्मनिर्भरता की राह पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

● वर्तमान में डॉ. समीर वी. कामत रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के अध्यक्ष और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव हैं। उन्होंने 26 अगस्त 2022 को यह पदभार ग्रहण किया था और उनके कार्यकाल को 2025 में एक वर्ष के लिए बढ़ाया गया है।

DRDO के बारे में मुख्य तथ्य:

अध्यक्ष: डॉ. समीर वी. कामत, अध्यक्ष

मुख्यालय: नई दिल्ली

मंत्रालय: रक्षा मंत्रालय (भारत सरकार)

काम: रक्षा प्रणाली और प्रौद्योगिकियों का स्वदेशी विकास करना।

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