महापैगम्बर भगवान श्री वासुदेव कृष्ण द्वारा लिखित महाग्रंथ श्रीमद्भागवतगीता का मूल रहस्य क्या है ?

श्रीमद्भगवद्गीता का मुख्य रहस्य निष्काम कर्म (फल की चिंता किए बिना कर्तव्य करना), आत्मा की अमरता, और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण है। यह जीवन के दुखों से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए कर्म, भक्ति, और ज्ञान योग का मार्ग बताती है, जो हर युग में प्रासंगिक है।

श्रीमद्भागवतगीता के प्रमुख रहस्य (सार):

■ निष्काम कर्म: श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म करना आपके हाथ में है, फल नहीं। बिना फल की इच्छा के अपना कर्तव्य करना ही सच्चा कर्म है।

■ आत्मा अमर है: आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; यह शाश्वत है, केवल शरीर बदलती है। इसलिए, मृत्यु का भय व्यर्थ है।

■ समर्पण और भक्ति: स्वयं को ईश्वर को समर्पित करने से ही परम शांति और मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त होती है।

■ मन पर नियंत्रण: गीता के अनुसार, काम (अत्यधिक इच्छा), क्रोध और लोभ पाप के तीन द्वार हैं, जिनसे बचना चाहिए और मन को स्थिर रखना चाहिए।

■ जीवन एक युद्ध है: जीवन की कठिनाइयों और दुविधाओं के सामने हार न मानकर, धर्म (कर्तव्य) के मार्ग पर टिके रहना ही गीता का संदेश है।

गीता को उपनिषदों का सार और जीवन जीने की कला का ज्ञान माना जाता है।

■ अध्याय 1 – गलत सोच ही जीवन की एकमात्र समस्या है।

● अध्याय 2 – सही ज्ञान ही हमारी सभी समस्याओं का अंतिम समाधान है।

● अध्याय 3 – निःस्वार्थता ही प्रगति और समृद्धि का एकमात्र मार्ग है।

● अध्याय 4 – प्रत्येक कार्य प्रार्थना का कार्य हो सकता है।

● अध्याय 5-व्यक्तित्व के अहंकार को त्यागें और अनंत के आनंद का आनंद लें।

● अध्याय 6 – प्रतिदिन उच्च चेतना से जुड़ें।

● अध्याय 7 – आप जो सीखते हैं उसे जिएं।

● अध्याय 8 – अपने आप को कभी मत छोड़ो।

● अध्याय 9 – अपने आशीर्वाद को महत्व दें।( चेतन मन द्वारा अवचेतन को दिया गया संदेश)

● अध्याय 10 – चारों ओर देवत्व देखें।

● अध्याय 11 – सत्य को जैसा है वैसा देखने के लिए पर्याप्त समर्पण करें।

● अध्याय 12 – अपने मन को उच्चतर में लीन करें।

● अध्याय 13 – माया से अलग होकर परमात्मा से जुड़ो।

● अध्याय 14 – एक ऐसी जीवन-शैली जिएं जो आपकी दृष्टि से मेल खाती हो।( अपने स्वभाव में जीना)

● अध्याय 15 – देवत्व को प्राथमिकता दें।

● अध्याय 16 – अच्छा होना अपने आप में एक पुरस्कार है।

● अध्याय 17 – सुखद पर अधिकार चुनना शक्ति की निशानी है।

● अध्याय 18 – चलो चलें, ईश्वर के साथ मिलन की ओर बढ़ते हैं।

जीवन विज्ञानमय बनाने के लिए वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक रहस्य को प्रदर्शित करना हीं श्रीमद्भागवतगीता का मूल स्रोत गीता जी का ज्ञान की अमल करना हीं महाविज्ञान की खोज करना है। श्रीमद्भागवतगीता महाविज्ञानग्रंथ हैं इस पर वैज्ञानिक अनुसंधान लगातार जारी है। यदि श्रीमद्भागवतगीता का मूल रहस्य का ज्ञान प्राप्त हो जाए तो, वह व्यक्ति भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यकाल का अखण्ड ज्ञाता हो जायगा, वह निष्काम कर्मक एवं निष्पाप कर्तव्य पथ पर अग्रसर बढता रहेगा और वह धर्मनिरपेक्ष बनकर ” वैज्ञानिक धम्म का निर्माण कर वैज्ञानिक चेतना जागृत करने, विकसित करने की निर्णायक कदम उठाए जायगा और वह तथागत बुद्ध बन जायगा, उसकी कृति ब्रह्मांड में याद पुन: याद किये जाते रहेंगें, इसलिए हे मानव! वैज्ञानिक विश्व बनाने के लिए देवव्रत भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा करो और अपने इस जीवविज्ञानिक शरीर के एक एक कतरा को अपने वतन के मातृभूमि को वीरदान कर दो, वैज्ञानिक अर्जुन एवं दानवीर कर्ण बन जाओ। श्रीमद्भागवतगीता की आधुनिक तकनीक वैज्ञानिक युग का सूत्रपात एवं निर्माणकर्ता है विज्ञानमेव जयते।

जय श्रीमद्भागवतगीता , जय श्रीवासुदेवकृष्ण:

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डाॅ बासुदेव कुमार शर्मा

प्रधान संपादक (वैज्ञानिक)

भौतिकविज्ञानी

विज्ञानमेव जयते PRGI भारत सरकार

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