क्या विज्ञान धरती को बचा पाएगा?

धरती आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सवाल सिर्फ विकास का नहीं, अस्तित्व का है। बढ़ता तापमान, पिघलते हिमनद, अनियमित मानसून, सूखा, बाढ़ और प्रदूषण—ये सभी संकेत दे रहे हैं कि प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न है: क्या विज्ञान धरती को बचा पाएगा?

संकट की वैज्ञानिक तस्वीर

वैज्ञानिक आँकड़े स्पष्ट हैं। वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। Intergovernmental Panel on Climate Change की रिपोर्टें बताती हैं कि यदि यही रफ्तार रही, तो आने वाले दशकों में समुद्र स्तर में तेज़ बढ़ोतरी, जैव-विविधता का बड़ा नुकसान और करोड़ों लोगों का विस्थापन तय है। यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि मापन पर आधारित निष्कर्ष है।

विज्ञान के पास क्या समाधान हैं?

विज्ञान केवल समस्या बताने तक सीमित नहीं है—वह समाधान भी दे रहा है।

1. स्वच्छ ऊर्जा की क्रांति

सौर और पवन ऊर्जा आज केवल विकल्प नहीं, बल्कि मुख्यधारा बन रही हैं। बैटरी स्टोरेज, स्मार्ट ग्रिड और हाइड्रोजन फ्यूल जैसी तकनीकें जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम कर रही हैं।

2. कार्बन को पकड़ने की तकनीक

कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS) जैसी तकनीकें हवा से कार्बन डाइऑक्साइड को अलग कर सुरक्षित रूप से संग्रहित करने पर काम कर रही हैं—यानी जो नुकसान हो चुका है, उसे आंशिक रूप से पलटने की कोशिश।

3. कृषि में वैज्ञानिक बदलाव

जलवायु-स्मार्ट खेती, सूखा-रोधी बीज, सटीक सिंचाई और एआई-आधारित फसल पूर्वानुमान—ये सब भोजन सुरक्षा को बचाने में मदद कर रहे हैं।

4. अंतरिक्ष से धरती की निगरानी

उपग्रहों के ज़रिये जंगलों की कटाई, समुद्र का तापमान और प्रदूषण पर नज़र रखी जा रही है। NASA और अन्य एजेंसियाँ पृथ्वी अवलोकन डेटा से नीति-निर्माताओं को ठोस आधार दे रही हैं।

विज्ञान अकेला काफी नहीं

यहाँ एक सच्चाई स्वीकार करनी होगी—विज्ञान समाधान दे सकता है, लेकिन निर्णय इंसान को लेने होंगे। तकनीक तभी असरदार होती है जब सरकारें, उद्योग और समाज मिलकर उसे अपनाएँ। अंतरराष्ट्रीय समझौते जैसे Paris Agreement दिखाते हैं कि इच्छाशक्ति हो तो दिशा बदली जा सकती है।

भारत की भूमिका

भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती भी है और अवसर भी। नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और टिकाऊ शहरीकरण में निवेश कर भारत न सिर्फ अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकता है, बल्कि वैश्विक समाधान का नेतृत्व भी कर सकता है।

अंतिम निष्कर्ष

तो क्या विज्ञान धरती को बचा पाएगा?

उत्तर है—हाँ, लेकिन शर्तों के साथ।

विज्ञान हमारे हाथ में औज़ार देता है; भविष्य का निर्माण हमारे निर्णय तय करेंगे। यदि ज्ञान के साथ नैतिकता और जिम्मेदारी जुड़ जाए, तो धरती को बचाना असंभव नहीं—बल्कि अनिवार्य है।

धरती को बचाने का विज्ञान मौजूद है। अब सवाल यह है—क्या हम उसे अपनाने के लिए तैयार हैं?

MANOJ ADHYAYI, Sr AI PROJECT MANAGER

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