राधा-कृष्ण का निस्वार्थ प्रेम: यह क्या दर्शाता है..!!

ओउम नम: वासुदेवाय: कृष्णाय: प्रेमाय: नमस्तस्यैं: नमो नम:

“इस ब्रह्मांड में सिर्फ और सिर्फ प्रेम संबंध हीं सर्वोच्च एवं सर्वोपरि, सर्वप्रिय महा आनंद, सुख और ऐश्वर्य, सृष्टिकाल की उत्पति है, प्यार प्राकृतिक आकर्षण है, प्रेम के लिए नफरत विकर्षण है, प्रेम हीं व्याकरणयुक्त, तत्व युक्त संरचनात्मक विज्ञान है, आप चाहे जितना भी कोशिश कर लें, जीत प्रेम की हीं होगी” ।

भगवान श्री कृष्ण का प्रेम निस्वार्थ, आत्मिक और अलौकिक है, राधा रानी के साथ समर्पण की सर्वोच्च मिसाल के रूप में जाना जाता है। उनका प्रेम किसी भौतिक बंधन में नहीं, बल्कि रूहानी मिलन में निहित है, जिसमें न अपेक्षाएं थीं, न कोई शर्त। रासलीला, गोपी-प्रेम और राधा के साथ उनका संबंध प्रेम के उच्चतम स्तर ‘भक्ति’ को दर्शाता है, जहाँ ‘राधा-कृष्ण’ एक ही सत्ता के दो रूप माने जाते हैं।

भगवान कृष्ण के प्रेम के प्रमुख पहलू:

राधा-कृष्ण का निस्वार्थ प्रेम: राधा और कृष्ण का प्रेम आध्यात्मिक मिलन है, न कि केवल साधारण लौकिक प्रेम। उनके प्रेम में अधिकार, बंधन या स्वार्थ की जगह समर्पण था।

राधा को कृष्ण की मुख्य संगिनी और प्रेम, कोमलता व करुणा की देवी माना जाता है।

आत्मिक मिलन: ऐसा माना जाता है कि कृष्ण ही राधा हैं और राधा ही कृष्ण हैं; वे एक ही शक्ति के दो रूप हैं।

गोपियों के साथ प्रेम: वृंदावन में गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम, निस्वार्थ समर्पण और भक्ति का प्रतीक है, जिसके लिए स्वयं कृष्ण ने कहा कि वे इस प्रेम को कभी नहीं चुका सकते।

प्रेम और अधिकार का संबंध: रुक्मिणी के साथ उनका संबंध जहाँ एक और पवित्र प्रेम को दर्शाता है, वहीं 16,108 रानियों के साथ विवाह के बावजूद, कृष्ण के प्रेम का मुख्य सार राधा के साथ ही जुड़ा रहा।

निस्वार्थ प्रेम का सार: कृष्ण का प्रेम सिखाता है कि सच्चा प्रेम बिना किसी स्वार्थ के होता है, जिसमें भक्त कृष्ण को और कृष्ण अपने भक्त को अपना सब कुछ समर्पित कर देते हैं।

श्री कृष्ण का प्रेम केवल स्त्री-पुरुष का प्रेम नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच की सर्वोच्च भक्ति भावना है।

भगवान श्री कृष्ण को सबसे ज्यादा प्रेम राधा रानी ने किया था।

राधा और कृष्ण का प्रेम कोई साधारण प्रेम नहीं था, वो आत्मिक मिलन था — ऐसा मिलन जिसमें न कोई अपेक्षा थी, न कोई शर्त। राधा ने कृष्ण को सिर्फ प्रेम किया, बिना किसी अधिकार, बंधन या स्वार्थ के। उनका प्रेम भक्ति और समर्पण की सबसे ऊँची मिसाल माना जाता है।

शास्त्रों और भक्तों की भावनाओं के अनुसार, राधा रानी का प्रेम सबसे पवित्र और सबसे गहरा था। यही कारण है कि आज भी जब श्रीकृष्ण का नाम लिया जाता है, तो राधा का नाम स्वतः जुड़ जाता है — “राधे-कृष्णा”।

हालांकि श्रीकृष्ण को उनकी माँ यशोदा का प्रेम भी बहुत प्रिय था — वो वात्सल्य और ममता का रूप था।

और मीरा बाई जैसी भक्तों ने भी उन्हें अपनी आत्मा तक समर्पित कर दिया था।

लेकिन अगर बात “सबसे ज्यादा” प्रेम की हो —

तो जवाब होगा: राधा रानी। क्योंकि उन्होंने न कृष्ण से विवाह माँगा, न अधिकार — सिर्फ निश्छल प्रेम दिया।

Q. राधा और कृष्ण में से किसका प्रेम अधिक महान था और क्यों?

पहला बात, भागवत कहे या महाभारत, या तो हरिवंश, या फिर भगवान विष्णु पर रचित सबसे पहला “विष्णु पुराण”, आपको राधा नाम की कोई प्रेमिका कृष्ण के जीवन में आपको देखने नहीं मिलेंगे। यह सब पौराणिक काल के कृति हैं।

दूसरा बात – कृष्ण जी की जीवन को देखेंगे तो पता चलेगा उन्होंने गोकुल छोड़ चुके था जब वो सिर्फ ग्यारह साल के थे। और राधा कृष्ण की जितनी कहानी या कथाएं आपको मिलेगा, सब गोकुल में ही है। अतः यह प्रेम कहानी था ही नहीं। अगर फिर भी मान लेंगे की इतने कम उम्र में वो प्रेम था, तो फिर उसे बाल सुलभ आकर्षण कहा जाएगा। जो कि कृष्ण को गोकुल की सभी गोपियां करती थी। कोई उन्हें माता, कोई बंधु और कोई प्यारे बदमाश के रूप में देखते थे जिन्हें माखन खाना पसंद है।

अब प्रश्न उठेगा, तो फिर “राधा कृष्ण” और बृंदावन यह सब क्या है?

इसके लिए इतिहास को थोड़ा देखिएगा।

राधा नाम की एक गोपी, यह विवरण पहली बार मिलता है “ ब्रमहविवर्ता पुराण” और श्री जयदेव रचित “ गीत गोविन्द” में।

ब्रमहविवर्ता पुराण, भी मूल लेख नहीं मिलता। यह कई अलग अलग समय पर लिखा गया है, जिसमें भगवान कृष्ण को ही सृष्टि का मूलाधार माना गया है। वहां एक अलग ब्रम्हांड है “गोलकधाम”, जिसमें कृष्ण और राधा के आदिरूप वास करते हैं। अब यह माने वाले लोगों को कृषणानुगामी कहा जाता है।

वैसे ही जयदेव जी के गीत गोविंद, लिखा गया था प्रणय रस में, जिसमें वो को कृष्ण राधा और उनके प्रेम पर ग्रंथ लिखे थे। यह भी मध्ययुगी या थोड़ा पूर्व ग्रंथ है।

अब आते हैं मध्ययुगीन इतिहास पर। १३५० के बाद भक्तिवाद बहुत तीव्र होने लगा और श्री चैतन्य देव इसके पुरोधर थे। ज्ञान मार्ग और तप मार्ग से लोग अध्यात्म से दूर हो रहे थे, इसलिए उन्होंने भक्तिवाद का सहारा लिया जिसमें इंसान अपने संसार में रहते हुए भी कृष्ण भगवान को अपना सकता है। साधारण मनुष्य को प्रेम कहानी पसंद है। इसलिए राधा कृष्ण की कहानी गौड़ीय तथा इस्कॉन आदि में इतना प्रसिद्ध है।

कुछ लोग तो दो कदम आगे चल पड़े और अपना ब्यभिचार को कृष्ण जी के चरित्र के साथ तुलना कर बैठे। दुख़ इस बात का है, की इसको और बढ़ावा दिया गया क्यूं की यह प्रसिद्ध होने लगा और इसकी व्यापारिकता तेज़ी से बढ़ते गई।

हालाकि, इसमें भी कोई गलती नहीं है, क्यों की सब विश्वास और भरोसा पर निर्भर करता है, लेकिन इसके चलते श्री कृष्ण जी जो दुनिया का प्रचण्ड व्यक्तित्वों में से एक होंगे, उनको बस एक कामुक तथा पराग्रही पुरुष के रूप में सीमित कर दिया गया। आज आप गीता ज्ञान किसी के पास नहीं देखेंगे, जो कि श्रीकृष्ण जी की मानव को सबसे बड़ा दान है। लेकिन राधा कृष्ण के नाम पर गली गली आपको शृतिकटू शस्ती प्रेम संगीत सुनने मिलेंगे।

कतई यह नहीं कह रहे है कि प्रेम भाव के विरूद्ध है, लेकिन कृष्ण जैसे चरित्र को लेकर आप अगर ऐसे गाना सुनते हो भक्ति संगीत के नाम पर “ लागी सावन की महीना मुरली बाजेगी ज़रूर, राधा नाचेगी ज़रूर”…तो इसके आगे और प्रेम किसका किया था बर्णन करने केलिए हमारे पास शब्द कम है।

सूचना – यह लेखक की अपनी मत है, इसको जात, धर्म, राज्य, देश, समुदाय आदि से न जोड़ा जाए। और इसकी राजनीतिक रूप बिलकुल नहीं है। सिर्फ और सिर्फ अपनी मत है।

कृष्ण के साथ राधा का दोहरा प्रतिनिधित्व है – प्रेमिका के साथ-साथ विवाहित पत्नी भी। निम्बार्क संप्रदाय जैसी परंपराएँ, राधा को कृष्ण की शाश्वत पत्नी और विवाहित पत्नी के रूप में पूजती हैं। वहीँ, गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय जैसी परम्पराएं उन्हें कृष्ण की प्रेमिका और दिव्य संगिनी के रूप में सम्मान देती हैं। राधावल्लभ संप्रदाय और हरिदासी संप्रदाय में, केवल राधा को परब्रह्म के रूप में पूजा जाता है। अन्यत्र, वह निंबार्क संप्रदाय, पुष्टिमार्ग, महानम संप्रदाय, वैष्णव-सहजिया, मणिपुरी वैष्णव और गौड़ीय संप्रदाय में कृष्ण की प्रमुख संगिनी और ह्लादिनी शक्ति के रूप में पूजनीय हैं। राधा को ब्रज गोपियों की प्रमुख और गोलोक तथा वृंदावन और बरसाना सहित ब्रज की रानी के रूप में वर्णित किया गया है। उन्होंने कई साहित्यिक कृतियों को प्रेरित किया है, और कृष्ण के साथ उनके रासलीला नृत्य ने कई प्रकार की प्रदर्शन कलाओं को प्रेरित किया है । कुल मिलाकर प्रेम तत्व संबंध के सामने सभी पदार्थ बौना है।

 

[डाॅ बासुदेव कुमार शर्मा ]

प्रधान संपादक [ वैज्ञानिक ]

विज्ञानमेव जयते RNI. भारत सरकार

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