मानव की खोज

मनुष्य की “खोज” किसी एक व्यक्ति ने नहीं की, बल्कि यह एक लंबी विकासवादी प्रक्रिया (Human Evolution) है, जिसके तहत आधुनिक मनुष्य (होमो सेपियंस) लगभग 3 लाख साल पहले अफ्रीका में वानर जैसे पूर्वजों से विकसित हुए और फिर दुनिया भर में फैले, जिसे विज्ञान मानव विकास सिद्धांत (Theory of Evolution) के ज़रिए समझाता है, जबकि धार्मिक कथाओं में आदम-हव्वा या मनु-शतरूपा जैसे प्रथम पुरुषों का उल्लेख है। बाद में, पूर्वी और मध्य अफ्रीका के जीवाश्मों से पता चलता है कि मनुष्य लगभग सात मिलियन वर्ष पहले अन्य महान वानरों से अलग हो गए थे। ये जीवाश्म प्रारंभिक मानव रिश्तेदारों के हैं और ये साहेलेंथ्रोपस , ओर्रोरिन और आर्डिपिथेकस वंश से संबंधित हैं। अंत में, मानव वंश, होमो , की उत्पत्ति कम से कम 28 लाख वर्ष पहले हुई थी।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Perspective):

विकासवादी प्रक्रिया (Evolutionary Process): मनुष्य किसी आविष्कार (invention) से नहीं, बल्कि प्राकृतिक चयन (natural selection) और लाखों वर्षों के क्रमिक विकास (gradual evolution) से बने हैं।

अफ्रीका से उत्पत्ति (Origin from Africa): आधुनिक मानव (Homo sapiens) की उत्पत्ति लगभग 2 से 3 लाख साल पहले अफ्रीका में हुई थी, जो पहले के होमिनिड्स (hominids) से विकसित हुए।

प्रमुख प्रजातियाँ (Key Species): इस विकास क्रम में ऑस्ट्रेलोपिथेकस, होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस, और निएंडरथल जैसी प्रजातियाँ शामिल थीं, जिनसे अंततः होमो सेपियंस बने।

प्रवास (Migration): लगभग 60,000 साल पहले, होमो सेपियंस अफ्रीका से निकलकर बाकी दुनिया में फैल गए।

धार्मिक और पौराणिक दृष्टिकोण (Religious & Mythological Perspectives):

ईसाई/इस्लाम (Christianity/Islam): आदम (Adam) और हव्वा (Eve) को पहले मनुष्य माना जाता है।

सनातन धर्म (Hinduism): ब्रह्मा के मानस पुत्र ‘मनु’ और पुत्री ‘शतरूपा’ को प्रथम पुरुष और स्त्री माना जाता है, जिनसे सृष्टि की शुरुआत हुई।

संक्षेप में, “मनुष्य की खोज” एक व्यक्ति का काम नहीं, बल्कि जीव विज्ञान और पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित एक प्राकृतिक और विकासवादी यात्रा है, जिसे वैज्ञानिक सिद्धांत समझाते हैं। हमारे पूर्वज चिंपाजी Homo sapiens sapiens ,हालांकि कुछ वैज्ञानिक “मनुष्य” शब्द की समानता होमो जीनस के सभी सदस्यों के साथ करते हैं, आम तौर पर यह होमो सेपियन्स को संदर्भित करता है, जो एकमात्र मौजूदा सदस्य है।मानव जीव विज्ञान (अंग्रेज़ी: Human biology ) एक शैक्षणिक अनुशासन है जिसमें अध्ययन के कई क्षेत्र शामिल हैं, जिनमें आनुवंशिकी, विकास, शरीर विज्ञान, शरीर रचना विज्ञान, महामारी विज्ञान, मानव विज्ञान, पारिस्थितिकी, पोषण, जनसंख्या आनुवंशिकी और सामाजिक- सांस्कृतिक कारक शामिल हैं। ब्रिटेन में, मनुष्यों की चार अलग-अलग प्रजातियों की पहचान की गई है। होमो एंटेसेसर सबसे प्राचीन है, उसके बाद होमो हाइडेलबर्गेंसिस, फिर निएंडरथल और अंत में हम, होमो सेपियंस । यह इन अंतःक्रियाओं और प्रभावों के माध्यम से मनुष्यों को देखता है।[1] यह जैवचिकित्सा विज्ञान, जैविक मानवविज्ञान, और अन्य जैविक विषयों के साथ कई संबंध साझा करता है जो मानव कामकाज के विभिन्न पहलुओं से निपटते हैं। 20वीं शताब्दी तक ऐसा नहीं था कि “मानव जीव विज्ञान” शब्द का प्रयोग जीव विज्ञान के भीतर एक विशिष्ट उपक्षेत्र को संदर्भित करने के लिए बायोजेरोन्टोलॉजिस्ट “रेमंड पर्ल” द्वारा किया गया था, जिन्होंने “(ह्यूमन बायोलॉजी जर्नल)ह्यूमन बायोलॉजी पत्रिका की स्थापना की थी। मानव विकास सहित “चार्ल्स डार्विन” के सिद्धांतों पर कई वैज्ञानिकों के पुनर्विचार के कारण, 1920 के दशक में एकीकृत मानव जीव विज्ञान उभरना शुरू हुआ। मानव जीव विज्ञान का विकास आनुवांशिकी और बाल विकास जैसी मानवीय विशेषताओं की जांच के परिणामस्वरूप हुआ था।

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धान, गेहूँ, मक्का की खोज 

धान, गेहूं और मक्का की खोज का इतिहास मानव सभ्यता के विकास से जुड़ा है, जहाँ गेहूं और जौ को लगभग 8,000 साल पहले फर्टाइल क्रिसेंट (उपजाऊ अर्धचंद्र) में पालतू बनाया गया था, जबकि धान (चावल) की खेती पूर्वी एशिया में शुरू हुई, और मक्का (टियोसिन्टे घास से) को लगभग 9,000-10,000 साल पहले मेक्सिको में मेसोअमेरिका के मूल निवासियों ने विकसित किया, जिससे ये दुनिया भर में मुख्य भोजन बने।

धान (Rice) (ओराय्ज़ा सैटिवा):

उत्पत्ति: लगभग 8,000 साल पहले पूर्वी एशिया (चीन, दक्षिण पूर्व एशिया) में, जहां ‘चावल’ और ‘भोजन’ अक्सर एक ही शब्द होते हैं।

भारत में: भारत की गंगा घाटी में लगभग 7000-5000 ईसा पूर्व के चावल के सेवन के प्रमाण मिले हैं।

गेहूं (Wheat):

उत्पत्ति: फर्टाइल क्रिसेंट (वर्तमान मध्य पूर्व) में लगभग 8,000 साल पहले जौ के साथ पालतू बनाया गया।

मक्का (Maize/Corn):

उत्पत्ति: लगभग 9,000-10,000 साल पहले दक्षिण-पूर्वी मेक्सिको में टियोसिन्टे (Teosinte) नामक जंगली घास से विकसित हुआ। प्रसार: कोलंबस के अमेरिका पहुंचने के बाद यह यूरोप, अफ्रीका और एशिया में फैला और जल्द ही वैश्विक फसल बन गया।

साझा इतिहास:

नवपाषाण काल (Neolithic Era): लगभग 8,000 साल पहले, अनाज की फसलों को पालतू बनाना शुरू हुआ।

हरित क्रांति (Green Revolution): 20वीं सदी में नॉर्मन बोरलॉग और एम.एस. स्वामीनाथन जैसे वैज्ञानिकों के प्रयासों से गेहूं और चावल की उपज में भारी वृद्धि हुई, जिससे खाद्य सुरक्षा बढ़ी।

संक्षेप में, ये फसलें हजारों वर्षों के चयन और विकास का परिणाम हैं, जो मानव समाजों के विकास और वैश्विक खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण रही हैं। यह जानकारी गूगल से संदर्भित है।

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(डाॅ बासुदेव कुमार शर्मा)

प्रधान संपादक (वैज्ञानिक)

विज्ञानमेव जयते PRGI भारत सरकार.

 

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