हरित क्रांति: भूख के अँधेरे से आत्मनिर्भर भारत तक

1960 के दशक का भारत—खाली गोदाम, विदेशी सहायता पर निर्भरता और अकाल का डर। यह केवल कृषि का संकट नहीं था, यह राष्ट्र की अस्मिता का प्रश्न बन चुका था। ऐसे समय में विज्ञान, नीति और किसान—तीनों को जोड़ने वाली एक चुपचाप लेकिन निर्णायक क्रांति जन्म ले रही थी—हरित क्रांति।

हरित क्रांति क्या थी?

हरित क्रांति एक कृषि-वैज्ञानिक आंदोलन था, जिसका लक्ष्य कम समय में अधिक उत्पादन था। इसके केंद्र में थे—

उच्च उपज किस्म (HYV) के बीज

नियंत्रित सिंचाई

रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक

कृषि यंत्रीकरण

सरकारी खरीद व न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)

पर यह सब एक साथ तभी संभव हुआ, जब किसी ने इसे दृष्टि और दिशा दी।

कहानी के नायक: एम.एस. स्वामीनाथन

केरल के कुट्टनाड क्षेत्र में जन्मे स्वामीनाथन ने बचपन में अकाल और भूख को बहुत पास से देखा। शायद यहीं से उनके भीतर यह विश्वास जगा कि “भूख केवल प्राकृतिक नहीं, नीतिगत विफलता भी है।”

विदेश में उन्नत कृषि अनुसंधान के बाद वे भारत लौटे—और लौटते ही भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल गेहूं व धान की उच्च उपज किस्मों पर काम शुरू किया।

प्रयोगशाला से खेत तक

स्वामीनाथन का योगदान केवल बीज तक सीमित नहीं था। उन्होंने यह समझा कि किसान तभी नई तकनीक अपनाएगा जब—

बीज भरोसेमंद हों।

पानी और उर्वरक समय पर मिलें।

फसल का न्यूनतम दाम सुनिश्चित हो।

उनकी पहल पर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूं की नई किस्में अपनाई गईं। परिणाम ऐतिहासिक रहा—भारत ने अनाज आयातक से अनाज निर्यातक बनने की राह पकड़ ली।

आँकड़ों में क्रांति

1965–66 में गेहूं उत्पादन: ~11 मिलियन टन

1970–71 में गेहूं उत्पादन: ~20 मिलियन टन

खाद्यान्न सुरक्षा मजबूत, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को स्थिर आधार । यह केवल संख्या नहीं थी—यह करोड़ों थालियों में रोटी थी।

उजला पक्ष और सीख

हरित क्रांति ने देश को भूख से उबारा, लेकिन इसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी सामने आए—मिट्टी की उर्वरता में कमी, जल-स्तर गिरना, रासायनिक निर्भरता।

स्वामीनाथन ने स्वयं आगे चलकर “सतत कृषि” और “किसान-केंद्रित विकास” पर ज़ोर दिया। उनका प्रसिद्ध कथन आज भी मार्गदर्शक है—“यदि कृषि टिकाऊ नहीं, तो विकास भी टिकाऊ नहीं।”

विरासत: विज्ञान + संवेदना

डॉ. स्वामीनाथन की सबसे बड़ी देन केवल हरित क्रांति नहीं, बल्कि यह सोच है कि कृषि नीति का केंद्र किसान और उपभोक्ता—दोनों हों।

आज जब जलवायु परिवर्तन और पोषण सुरक्षा की चुनौतियाँ हैं, उनकी सीख हमें दूसरी हरित क्रांति—सतत, पोषण-सुरक्षित और पर्यावरण-संवेदी—की ओर बुलाती है।

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MANOJ ADHYAYI, Sr AI PROJECT MANAGER

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