क्या उपनिषद क्वांटम सिद्धांत का पूर्वाभास देते हैं?
प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद
जब बीसवीं शताब्दी में क्वांटम भौतिकी ने ब्रह्मांड की हमारी समझ को पूरी तरह बदल दिया, तो अनेक विद्वानों ने एक रोचक समानता पर ध्यान दिया। अनिश्चितता, पारस्परिक जुड़ाव और इंद्रिय-बोध की सीमाएँ—ये सभी विचार आधुनिक विज्ञान में उभरे, लेकिन इनकी गूंज हमें हज़ारों वर्ष पुराने उपनिषदों में भी सुनाई देती है।
तो क्या उपनिषदों ने आधुनिक क्वांटम सिद्धांत का वर्णन पहले ही कर दिया था?
उत्तर है—नहीं, लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती।
दो परंपराएँ, दो दृष्टिकोण
उपनिषद (लगभग 800–300 ईसा पूर्व) दार्शनिक और आध्यात्मिक ग्रंथ हैं। उनका मुख्य विषय है—ब्रह्म (परम सत्य), आत्मा (चेतना) और ज्ञान द्वारा मुक्ति। उनकी पद्धति अंतर्मुखी है—चिंतन, संवाद, ध्यान और अनुभूति।
इसके विपरीत, क्वांटम सिद्धांत प्रयोगों, गणितीय समीकरणों और परीक्षण-योग्य निष्कर्षों पर आधारित एक वैज्ञानिक ढांचा है, जो सूक्ष्म स्तर पर पदार्थ और ऊर्जा के व्यवहार को समझाता है।
दोनों के मार्ग अलग हैं—पर प्रश्न कभी-कभी समान लगते हैं।
उपनिषदों का केंद्रीय विचार है अद्वैत:
सत्य एक है, वह अनेक रूपों में प्रकट होता है।
आधुनिक भौतिकी भी संकेत देती है कि जिन कणों को हम अलग-अलग मानते हैं, वे वास्तव में गहरे स्तर पर मौजूद क्वांटम फ़ील्ड्स की अभिव्यक्तियाँ हैं। बाहरी भिन्नता के पीछे एक गहन एकता छिपी हो सकती है।
यह समानता दार्शनिक है—वैज्ञानिक नहीं—पर विचारोत्तेजक अवश्य है।
पर्यवेक्षक की भूमिका
उपनिषदों में चेतना को अनुभव का केंद्र माना गया है। चेतना के बिना संसार का अर्थ नहीं।
क्वांटम भौतिकी में भी यह तथ्य चौंकाता है कि मापन (measurement) से पहले कण एक निश्चित अवस्था में नहीं होते, बल्कि संभावनाओं के रूप में मौजूद रहते हैं।
हालाँकि यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है—क्वांटम विज्ञान में “पर्यवेक्षक” का अर्थ मानव चेतना होना आवश्यक नहीं; कोई भी मापन-उपकरण यह भूमिका निभा सकता है। फिर भी, अवलोकन का प्रभाव चर्चा को जन्म देता है।
अनिश्चितता और परिवर्तनशील संसार
उपनिषद जगत को स्थिर नहीं मानते—वह परिवर्तनशील, क्षणभंगुर और मायामय है।
क्वांटम सिद्धांत इस अनिश्चितता को गणितीय नियमों में बाँधता है, जैसे हाइज़नबर्ग अनिश्चितता सिद्धांत, जो बताता है कि प्रकृति के मूल स्तर पर पूर्ण निश्चितता संभव नहीं।
दोनों दृष्टियाँ यांत्रिक और पूर्णतः नियत ब्रह्मांड की धारणा को चुनौती देती हैं।
भाषा की सीमाएँ
उपनिषद कहते हैं:
“जहाँ से शब्द भी लौट आते हैं।”
अर्थात परम सत्य शब्दों से परे है।
क्वांटम भौतिकी में भी यही समस्या सामने आती है। इसके सिद्धांतों को साधारण भाषा में समझाना कठिन है; गणित ही इसकी सबसे सटीक भाषा बन जाती है।
दोनों ही मानते हैं कि वास्तविकता हमारी सामान्य समझ से आगे है।
क्या नहीं कहना चाहिए
यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है कि उपनिषदों में क्वांटम भौतिकी “पहले से मौजूद” थी।
उपनिषद न तो प्रयोग प्रस्तुत करते हैं, न समीकरण, न भविष्यवाणी-योग्य मॉडल।
यहाँ समानता विचारों की है, विज्ञान की नहीं।
फिर यह तुलना क्यों आकर्षित करती है?
एरविन श्रॉडिंगर और वर्नर हाइज़नबर्ग जैसे कई अग्रणी वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया कि भारतीय दर्शन ने उन्हें गहराई से सोचने की प्रेरणा दी। यह प्रेरणा थी—प्रमाण नहीं।
एक साझा मानवीय खोज
उपनिषद और क्वांटम सिद्धांत दोनों अलग-अलग युगों और विधियों से एक ही गहरे प्रश्न से जूझते हैं—
वास्तविकता क्या है, और हम उसे कितना जान सकते हैं?
निष्कर्ष
उपनिषद क्वांटम की पाठ्यपुस्तक नहीं हैं, और क्वांटम भौतिकी आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं।
फिर भी दोनों हमें एक महत्वपूर्ण सत्य की ओर संकेत करते हैं:
वास्तविकता उतनी सरल नहीं जितनी दिखाई देती है—और सच्चा ज्ञान वहीं से शुरू होता है, जहाँ निश्चितता समाप्त होती है।
प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान अलग प्रश्न पूछते हैं, लेकिन मिलकर वे हमारी समझ की सीमाओं को और विस्तृत करते हैं।
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MANOJ ADHYAYI, Sr AI PROJECT MANAGER
