क्या इंसान अब प्रकृति को फिर से लिख रहा है?

जब हम “प्रकृति” कहते हैं, तो हमारे सामने जंगल, नदियाँ, पहाड़ और आसमान की तस्वीर उभरती है। लेकिन 21वीं सदी में एक नई तस्वीर बन रही है—लैबोरेट्री के भीतर DNA की डबल हेलिक्स, कंप्यूटर स्क्रीन पर जीन कोड, और माइक्रोचिप पर डिज़ाइन होता जीवन। सवाल उठता है: क्या इंसान अब प्रकृति को फिर से लिख रहा है?

जीन एडिटिंग: जीवन की स्क्रिप्ट में बदलाव

आज विज्ञान के पास एक अद्भुत उपकरण है—CRISPR। यह तकनीक वैज्ञानिकों को DNA के भीतर मौजूद जीन को काटने, बदलने या सुधारने की क्षमता देती है। पहले जहाँ आनुवंशिक बीमारियाँ भाग्य मानी जाती थीं, अब उन्हें ठीक करने की कोशिश हो रही है।
सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया जैसी बीमारियों के इलाज पर काम हो रहा है। वैज्ञानिक पौधों को ऐसा बना रहे हैं जो कम पानी में भी उग सकें। यानी हम केवल प्रकृति को समझ नहीं रहे—हम उसकी “कोडिंग” बदल रहे हैं।
लेकिन क्या यह उपचार है या हस्तक्षेप? यही बहस की असली शुरुआत है।

सिंथेटिक बायोलॉजी: नया जीवन बनाना

Synthetic biology के क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में ऐसे सूक्ष्म जीव बना रहे हैं जो दवाइयाँ, बायोफ्यूल और यहां तक कि प्लास्टिक के विकल्प तैयार कर सकें। लैब में उगाया गया मांस (lab-grown meat) अब कल्पना नहीं, वास्तविकता बन रहा है।

यह सब हमें एक नई दिशा में ले जाता है—जहाँ जीवन केवल जन्म नहीं लेता, बल्कि “डिज़ाइन” भी किया जाता है।

जलवायु इंजीनियरिंग: मौसम को नियंत्रित करने की कोशिश

ग्लोबल वार्मिंग से जूझती दुनिया अब Climate engineering जैसे उपायों पर विचार कर रही है। बादलों में रसायन छोड़कर बारिश करवाना, वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड निकालना, या सूर्य की किरणों को परावर्तित करने के प्रयोग—ये सब संकेत हैं कि इंसान अब मौसम को भी “मैनेज” करना चाहता है।

पर सवाल वही है—क्या हम समाधान ढूंढ रहे हैं या एक नई समस्या को जन्म दे रहे हैं?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जीवन

Artificial intelligence अब दवाइयों की खोज, जीन विश्लेषण और पर्यावरण मॉडलिंग में बड़ी भूमिका निभा रहा है। AI लाखों डेटा पॉइंट्स का विश्लेषण कर यह बता सकता है कि किस जीन में बदलाव से कौन-सा परिणाम आएगा।

यहाँ इंसान अकेला “लेखक” नहीं रहा; मशीनें भी सह-लेखक बन चुकी हैं।

नैतिकता का प्रश्न: सीमा कहाँ है?

प्रकृति को “फिर से लिखना” एक रोमांचक संभावना है, पर इसके साथ गहरी नैतिक चिंताएँ भी जुड़ी हैं:

क्या हमें “डिज़ाइनर बेबी” बनाने का अधिकार है?

क्या आर्थिक रूप से सक्षम लोग बेहतर जीन खरीद सकेंगे?

क्या जैव विविधता खतरे में पड़ सकती है?

विज्ञान शक्ति देता है, लेकिन दिशा समाज तय करता है।

निष्कर्ष:

शायद इंसान प्रकृति को पूरी तरह से फिर से नहीं लिख रहा, बल्कि उसकी अधूरी पंक्तियों को संपादित कर रहा है। हम “ईश्वर” नहीं बने हैं, लेकिन एक शक्तिशाली संपादक ज़रूर बन गए हैं।

अंततः प्रश्न यह नहीं कि क्या हम प्रकृति को बदल सकते हैं—

प्रश्न यह है कि क्या हम इसे बदलते समय उतने ही संवेदनशील और जिम्मेदार रहेंगे जितनी प्रकृति स्वयं है?

विज्ञान की कलम हमारे हाथ में है। अब यह हम पर है कि हम इससे भविष्य लिखते हैं—या एक नई त्रुटि।

—-+++—-

MANOJ ADHYAYI, Sr AI PROJECT MANAGER

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *