भारत: प्रतिभा का देश, लेकिन खोज की कमी क्यों?
भारत को अक्सर “टैलेंट की महाशक्ति” कहा जाता है। हर साल लाखों इंजीनियर, डॉक्टर और वैज्ञानिक निकलते हैं। फिर भी जब बात होती है नई खोजों, पेटेंट, नोबेल पुरस्कार या अत्याधुनिक तकनीक की—तो भारत का नाम पीछे रह जाता है।
आख़िर क्यों?
क्या भारतीय दिमाग़ कमजोर है?
या व्यवस्था ही खोज को जन्म नहीं लेने देती?
🧠 आम भाषा में समस्या समझिए
आज की दुनिया में ताक़त का मतलब है:
कौन नई दवा खोजता है
कौन नई तकनीक बनाता है
कौन भविष्य की मशीनें डिज़ाइन करता है
भारत इनमें ज़्यादातर मामलों में उपभोक्ता है, निर्माता नहीं।
🔍 मुख्य कारण — सरल शब्दों में
1️⃣ रिसर्च पर कम खर्च
भारत अपनी कमाई (GDP) का 1% से भी कम हिस्सा रिसर्च पर खर्च करता है।
जबकि विकसित देश 3–5% तक निवेश करते हैं।
कम निवेश = कम प्रयोग = कम खोज
2️⃣ पढ़ाई ज़्यादा, प्रयोग कम
हमारी शिक्षा:
रटने पर ज़ोर देती है
सवाल पूछने से ज़्यादा नंबर लाने पर
फेल होने से डराती है
जबकि रिसर्च की शुरुआत ही गलती करने से होती है।
3️⃣ अच्छे दिमाग़, पर विदेश की लैब
भारत के सबसे तेज़ दिमाग़:
अमेरिका, यूरोप की लैब में काम कर रहे हैं
क्योंकि वहाँ बेहतर सुविधाएँ और आज़ादी है
इसे कहते हैं ब्रेन ड्रेन।
4️⃣ रिसर्च = सुरक्षित करियर नहीं
भारत में रिसर्च करने वाला युवा:
कम वेतन
अस्थिर भविष्य
सम्मान की कमी
जबकि प्राइवेट नौकरी ज़्यादा सुरक्षित लगती है।
5️⃣ काग़ज़ी काम और धीमी व्यवस्था
रिसर्च के लिए:
महीनों फाइलें
सालों में उपकरण
हर कदम पर अनुमति
खोज की रफ्तार यहीं धीमी हो जाती है।
💡 तो समाधान क्या है?
✅ 1. रिसर्च को खर्च नहीं, निवेश समझा जाए
सरकार और कंपनियाँ मिलकर ज़्यादा पैसा रिसर्च में लगाएँ।
✅ 2. स्कूल से जिज्ञासा सिखाई जाए
बच्चों को सवाल पूछने, प्रयोग करने और असफल होने दिया जाए।
✅ 3. रिसर्च को सम्मान और सुरक्षा मिले
वैज्ञानिकों को:
सम्मान
स्थिर करियर
बेहतर सुविधाएँ
✅ 4. भारत में वर्ल्ड-क्लास लैब
ताकि हमारे वैज्ञानिक विदेश न जाएँ, या लौट आएँ।
🔮 अगर अब नहीं बदले तो…
भारत तकनीक खरीदेगा, बनाएगा नहीं
नौकरियाँ बाहर की तकनीक पर निर्भर होंगी
भविष्य की दौड़ में हम दर्शक बन सकते हैं
✨ निष्कर्ष (Conclusion)
भारत के पास दिमाग़ की कमी नहीं है, कमी है तो रिसर्च को प्राथमिकता देने की।
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MANOJ ADHYAYI, Sr AI PROJECT MANAGER
