भारत तकनीक का उपभोक्ता क्यों है, निर्माता क्यों नहीं?
उपयोगकर्ता से नवोन्मेषक बनने की भारतीय यात्रा
आज भारत दुनिया के सबसे बड़े तकनीकी उपभोक्ताओं में शामिल है। स्मार्टफोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया, क्लाउड और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—हर नई तकनीक को भारत न केवल तेजी से अपनाता है, बल्कि बड़े पैमाने पर उपयोग भी करता है। किंतु जब बात मूल तकनीक के विकास, वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म के स्वामित्व या तकनीकी मानक तय करने की आती है, तो भारत अभी भी अमेरिका, चीन और इज़राइल जैसे देशों से पीछे दिखाई देता है।
प्रश्न यह नहीं है कि भारत में प्रतिभा की कमी है—
प्रश्न यह है कि भारत की व्यवस्था नवाचार को कितना प्रोत्साहित करती है।
स्वतंत्रता के बाद की प्राथमिकताएँ: नवाचार से पहले अस्तित्व
स्वतंत्रता के बाद भारत की प्राथमिकताएँ स्वाभाविक थीं—खाद्य सुरक्षा, बुनियादी उद्योग, सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता। उस दौर में तकनीकी नवाचार विलासिता समझा गया। लाइसेंस-परमिट राज जैसी व्यवस्थाओं ने निजी क्षेत्र में जोखिम लेने की संस्कृति को हतोत्साहित किया।
जब विश्व सेमीकंडक्टर, कंप्यूटिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स में निवेश कर रहा था, भारत स्थिरता की तलाश में था। यही अंतर आगे चलकर तकनीकी पिछड़ापन बन गया।
डिग्री देने वाली शिक्षा, खोज करने वाली नहीं
भारत हर वर्ष लाखों इंजीनियर और स्नातक तैयार करता है। फिर भी:
रटने की संस्कृति हावी रही
परीक्षा-केन्द्रित शिक्षा ने जिज्ञासा को दबाया
शोध और प्रयोग को प्राथमिकता नहीं मिली
परिणामस्वरूप, भारत ने कुशल कर्मचारी तो पैदा किए, पर वैज्ञानिक खोजकर्ता और तकनीकी आर्किटेक्ट अपेक्षाकृत कम।
आईटी सेवाओं की सफलता और उसकी सीमा
भारतीय आईटी उद्योग ने वैश्विक पहचान दिलाई। आउटसोर्सिंग मॉडल ने रोजगार और विदेशी मुद्रा प्रदान की। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह रहा कि:
भारत समाधान बनाता रहा, प्लेटफ़ॉर्म नहीं
विदेशी तकनीक पर निर्भरता बढ़ती गई
जोखिमपूर्ण नवाचार की संस्कृति विकसित नहीं हो पाई
हम तकनीक के बेहतर उपयोगकर्ता बने, स्वामी नहीं।
अनुसंधान एवं विकास में कम निवेश
कोई भी देश नवाचार में तभी आगे बढ़ता है जब वह अनुसंधान में निवेश करे। भारत आज भी GDP का 1% से कम अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करता है। इसके कारण:
डीप-टेक स्टार्टअप्स सीमित रहे
स्वदेशी कोर तकनीक का अभाव रहा
विश्वविद्यालयों का शोध उद्योग तक नहीं पहुँच पाया
असफलता से डरता समाज
नवाचार की राह असफलताओं से होकर जाती है। किंतु भारतीय सामाजिक ढाँचा असफलता को स्वीकार नहीं करता। सुरक्षित नौकरी, त्वरित सफलता और स्थायित्व को प्राथमिकता दी जाती है।
जब तक असफलता को सीख का माध्यम नहीं माना जाएगा, नवाचार सीमित ही रहेगा।
बड़ा बाज़ार, पर कम स्वामित्व
भारत विश्व का सबसे बड़ा डिजिटल बाज़ार है। यही कारण है कि विदेशी कंपनियाँ यहाँ तेजी से विस्तार करती हैं। सस्ती सेवाएँ और विशाल उपभोक्ता आधार भारत को आकर्षक बनाते हैं—पर इससे देश तकनीक का उपभोक्ता बनकर रह जाता है, निर्माता नहीं।
प्रतिभा का पलायन और बौद्धिक संपदा की क्षति
भारत के कई श्रेष्ठ वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ विदेशों में अनुसंधान करते हैं। बेहतर प्रयोगशालाएँ, तेज़ फंडिंग और मज़बूत पेटेंट व्यवस्था उन्हें आकर्षित करती है। नतीजा यह होता है कि भारतीय प्रतिभा से उत्पन्न बौद्धिक संपदा अन्य देशों के काम आती है।
बदलाव की शुरुआत
हाल के वर्षों में भारत में सकारात्मक बदलाव दिखने लगे हैं:
UPI, आधार और ONDC जैसी डिजिटल सार्वजनिक संरचनाएँ
सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश
स्टार्टअप और डीप-टेक को बढ़ावा
सरकार की भूमिका: नियामक से नवाचार-सहयोगी
यह संकेत है कि भारत अब केवल उपयोगकर्ता नहीं रहना चाहता।
आगे की राह
यदि भारत को तकनीकी निर्माता बनना है, तो आवश्यक है:
अनुसंधान पर अधिक निवेश
शिक्षा में रचनात्मकता और प्रयोग को स्थान
पेटेंट और बौद्धिक संपदा को सम्मान
सरकार का स्वदेशी तकनीक का पहला ग्राहक बनना
असफलता को स्वीकारने की सामाजिक संस्कृति
निष्कर्ष
भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है।कमी है ऐसी व्यवस्था की, जो आविष्कार को पुरस्कृत करे।
आने वाला दशक तय करेगा कि भारत केवल तकनीक का सबसे बड़ा उपभोक्ता बना रहेगा—या विश्व का अग्रणी नवाचारक देश बनेगा।
[M K Sr AI PROJECT MANAGER]
