भारतीय संविधान की अनुच्छेद 330 को संसोधित कर दिया जाए तो दलित और दलित नेताओ का क्या होगा?
बिहार के सबसे प्रमुख और लोकप्रिय दलित नेताओं में रामविलास पासवान का नाम सबसे ऊपर आता है, जिन्हें भारतीय राजनीति का ‘मौसम वैज्ञानिक’ भी कहा जाता था। उनके अलावा, पूर्व मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री, जीतन राम मांझी, और चिराग पासवान भी बिहार की राजनीति में दलित समुदाय के बड़े चेहरे रहे हैं।
रामविलास पासवान: नौ बार लोकसभा सांसद रहे और कई सरकारों में केंद्रीय मंत्री।
भोला पासवान शास्त्री: बिहार के दलित मुख्यमंत्री (1968-1982 के बीच तीन बार)।
जीतन राम मांझी: पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के संस्थापक।
चिराग पासवान: पासवान समुदाय के युवा नेता, जो ‘बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट’ के साथ अपनी पहचान बना रहे हैं। इनके अलावे श्री अशोक चौधरी, श्री श्याम रजक आदि नेता हैं।
ये नेता बिहार में दलितों के उत्थान और राजनीतिक भागीदारी के लिए अहम रहे हैं, विशेषकर पासवान और महादलित समुदायों के बीच। लेकिन दलित नेता की शृंखला बनानें में सबसे पिच्छे चल रहें है ये सभी नेता । भारत में एक सबसे बङा राजनीतिक पार्टी, भारतीय जनता पार्टी है जिसमें इनलोगों का कल्याण हो रहा है, नहीं तो इनलोगों अपना व्यक्तिगत दिमाग नहीं है कि आजादी 75 वर्ष से अधिक बित जाने के बाद भी दलितों के समाजिक स्तर में सुधार नहीं हुआ।
डाॅ बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने दस वर्ष के लिए दिया था आरक्षण, सुधार नहीं होने पर बढाया भी जा सकता है। सामाज में अनुसूचित जाति एक्ट हीं सामाजिक न्याय की मांग कर रहा है, निर्दोष को हीं पैसा लेकर फंसाते हैं ये अनुसूचित जाति के लोग, सवर्ण एवं पैसे वाला इनको अपना हथियार बना लिया है, सबसे ज्यादा पिछङावर्ग समुदाय के लोग अनुसूचित जाति एक्ट से प्रभावित है, यहीं फुट डालो शासन करों का नियम साबित होता है। दलित और पिछङावर्ग समुदाय के लोग 86% से अधिक है, यदि ये नेता अपनों के प्रति सुधार लाएं तो संभावना है कि आने वाला समय में सुधार संभव है। राष्ट्रीय पिछङावर्ग आयोग भारतीय संविधान की अनुच्छेद 340 को 330 की तरह लागू करने पर विचार विमर्श कर रही है, यदि ऐसा होता है तो दलित और पिछङावर्ग में समानता हो सकती है अनयथा संभव नहीं है।
डाॅ बासुदेव कुमार शर्मा
प्रधान संपादक ( वैज्ञानिक)
विज्ञानमेव जयते RNI भारत सरकार.
